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Saturday, December 20, 2025

માનસ ત્રિપતિ - 969

 

રામ કથા - 969

માનસ ત્રિપતિ

Tirupati - Andhra Pradesh

શનિવાર, તારીખ 20/12/2025 થી રવિવાર, તારીખ 28/12/2025

મુખ્ય ચોપાઈ

श्रीपति निज माया तब प्रेरी।

सुनहु कठिन करनी तेहि केरी॥

राम रमापति कर धनु लेहू।

खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥

भूमि सप्त सागर मेखला।

एक भूप रघुपति कोसला।।

 

 

 

 

1

Saturday, 20/12/2025

तब नारद हरि पद सिर नाई। चले हृदयँ अहमिति अधिकाई॥

श्रीपति निज माया तब प्रेरी। सुनहु कठिन करनी तेहि केरी॥4॥

तब नारदजी भगवान के चरणों में सिर नवाकर चले। उनके हृदय में अभिमान और भी बढ़ गया। तब लक्ष्मीपति भगवान ने अपनी माया को प्रेरित किया। अब उसकी कठिन करनी सुनो॥4॥

राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥

देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ॥4॥

(परशुरामजी ने कहा-) हे राम! हे लक्ष्मीपति! धनुष को हाथ में (अथवा लक्ष्मीपति विष्णु का धनुष) लीजिए और इसे खींचिए, जिससे मेरा संदेह मिट जाए। परशुरामजी धनुष देने लगे, तब वह आप ही चला गया। तब परशुरामजी के मन में बड़ा आश्चर्य हुआ॥4॥

भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला।।

भुवन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू।।1।।

 

अयोध्या में श्रीरघुनाथजी सात समुद्रों की मेखला (करधनी) वाली पृथ्वीके एकमात्र राजा हैं। जिनके एक-एक रोम में अनेकों ब्रह्माण्ड हैं, उनके लिये सात द्वीपों की यह प्रभुता कुछ अधिक नहीं है।।1।।

 

પહેલા શ્વાસ અને અંતિમ શ્વાસ વચ્ચે વિશ્વાસ રાખવો.

બાલકાંડ જન્મોત્સવ છે.

અયોધ્યાકાંડ પ્રેમોત્સવ છે.

અરણ્યકાંડ વનોત્સવ છે.

કિષ્કિંધાકાંડ મિત્રોત્સવ છે

સુંદરકાંડ શરણોત્સવ છે.

લંકાકાંડ રણોત્સવ છે.

ઉત્તરકાંડ પરમોત્સવ છે.

શ્રવણ સુધા છે.

ઉત્સનો અર્થ ઝરણું થાય છે.

2

Sunday, 21/12/2025

निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥

भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥3॥

 

जो मनुष्य निर्मल मन का होता है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट और छल-छिद्र नहीं सुहाते। यदि उसे रावण ने भेद लेने को भेजा है, तब भी हे सुग्रीव! अपने को कुछ भी भय या हानि नहीं है॥3॥

पंचशील

1.      मनश्री - शील

2.      नयनश्री - शील

3.      श्रवणश्री - शील

4.      शब्दश्री – निर्मल बानी

5.      मुखश्री

यह पांचो का पति परमात्मा हैं जो श्रीपति हैं।

भक्तिमणि सापेक्ष नहीं हैं।

સત્ય, શ્રદ્ધા, વિજ્ઞાન, નિષ્ઠા, આકાશ – અવકાશ, શૂન્ય. પૂર્ણ વગેરે આઠ જાણવા યોગ્ય છે, જ્ઞાતવ્ય છે.  …… છાન્દોગ્ય ઉપનિષદ

 

 

3

Monday, 22/12/2025

બુદ્ધ પુરુષનાં વચન કાલાંતરે શાસ્ત્ર બની જાય છે.

સતી, શરભંગ અને શબરી રામાયણમાં યોગના પ્રમાણ છે.

શબરીને દાંત નથી પણ તે વેદાંતી છે.

કથા શાસ્વત છે, કથા પરમાત્માનું પરમ સાનિધ્ય છે, કથા શ્રવણ પરમ સાધન છે.

 

पृथिव्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते।

न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम्‌॥

 

When the fivefold perception of Yoga, arising from (concentrating the mind on) earth, water, light, air and ether, have appeared to the Yogin, then he has become possessed of a body made of the fire of Yoga, and he will not be touched by disease, old age or death.

 

जब योगी के समक्ष योग के द्वारा योग के पाँच गुण प्रकट हो जाते हैं तब उसे योगाग्नि से बना शरीर प्राप्त हो जाता है और तब वह रोग, जरा, मृत्यु से मुक्त हो जाता है।

"न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम्"  एक संस्कृत श्लोक है जिसका अर्थ है कि जिस व्यक्ति को योगाग्नि से युक्त शरीर प्राप्त हो जाता है, उसे रोग, बुढ़ापा (जरा), और मृत्यु नहीं होती. यह श्वेताश्वतरोपनिषद (श्लोक 2.12) से लिया गया है और योग के उच्च स्तर (पंचाग्नि विद्या) को प्राप्त करने पर मिलने वाले लाभों का वर्णन करता है, जहाँ साधक पंचमहाभूतों पर नियंत्रण प्राप्त कर शरीर को अमरत्व के करीब ले जाता है.

जब पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाशइन पाँचों महाभूतों (तत्वों) से उत्पन्न योग के गुणों (सिद्धियों) में व्यक्ति का प्रवेश हो जाता है, तो उसे योगाग्नि से बना शरीर प्राप्त होता है. ऐसे योगी को फिर न कोई रोग होता है, न बुढ़ापा आता है, और न ही मृत्यु का भय रहता है (अर्थात वह मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है).

यह उक्ति बताती है कि गहन योग साधना (विशेषकर पंचाग्नि विद्या) से शरीर इतना शुद्ध और शक्तिशाली हो जाता है कि वह सामान्य शारीरिक सीमाओं, जैसे बीमारी, बुढ़ापा और मृत्यु, से ऊपर उठ जाता है. यह एक प्रकार से इच्छा-मृत्यु (अपनी इच्छा से शरीर त्यागने) या अमरता की ओर इशारा करता है।

આપણા ઘરમાં સાધન હોય, ગુરુના ઘરમાં સાધના હોય, આપણા ધરમાં શસ્ત્ર હોય, ગુરુના ઘરમાં શાસ્ત્ર હોય.

ધર્મશ્રી, કર્મશ્રી, ચર્મશ્રી - સૌદર્યશ્રી (શરીરનું સૌદર્ય), વનશ્રી, પદ્યશ્રી વગેરે પણ શ્રી છે.

કથામાં જે આનંદ મળે છે તેવો આનંદ ક્યાંય બીજે નથી મળતો.

મનમાં સંદેહ પેદા થાય તો તે વિનાશ તરફ લઈ જાય છે, તેથી મનમાં સંદેહ પેદા ન થવા દેવો. સતીના મનમાં સંદેહ પેદા થતાં સતીનો વિનાશ થાય છે.

4

Tuesday, 23/12/25

સાધુની ભાષા સાંકેતિક હોય છે તેથી સમજમાં નથી આવતી.

લક્ષ્મીના પાંચ રુપ

ધન લક્ષ્મી – પરિશ્રમથી કમાયેલા પૈસા પરમાર્થમાં વપરાય એ લક્ષ્મી ધન છે.

ગૃહ લક્ષ્મી

પૃથ્વી લક્ષ્મી

વૈકુંઠ લક્ષ્મી

શુભ લક્ષ્મી – સંસ્કારની લક્ષ્મી, ઊચ્ચ વિચારની લક્ષ્મી

મૌનશ્રી – મૌન પણ લક્ષ્મી છે.

Day 6

25/12/2025

ગુરુની પાદૂકા મહાલક્ષ્મી છે, આપણું સૌભાગ્ય છે.

પ્રાણ સંકટ સમયે બચાવનાર સૌભાગ્ય છે, પાદૂકા પ્રાણ સંકટ સમયે રક્ષા કરે છે.

चरनपीठ करुनानिधान के। जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के॥

संपुट भरत सनेह रतन के। आखर जुग जनु जीव जतन के॥3॥

करुणानिधान श्री रामचंद्रजी के दोनों ख़ड़ाऊँ प्रजा के प्राणों की रक्षा के लिए मानो दो पहरेदार हैं। भरतजी के प्रेमरूपी रत्न के लिए मानो डिब्बा है और जीव के साधन के लिए मानो राम-नाम के दो अक्षर हैं॥3॥

 

 

 

 

कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के॥

भरत मुदित अवलंब लहे तें। अस सुख जस सिय रामु रहे तें॥4॥

 

रघुकुल (की रक्षा) के लिए दो किवाड़ हैं। कुशल (श्रेष्ठ) कर्म करने के लिए दो हाथ की भाँति (सहायक) हैं और सेवा रूपी श्रेष्ठ धर्म के सुझाने के लिए निर्मल नेत्र हैं। भरतजी इस अवलंब के मिल जाने से परम आनंदित हैं। उन्हें ऐसा ही सुख हुआ, जैसा श्री सीता-रामजी के रहने से होता है॥4॥

 

वेद हमारी संपदा हैं।

 

Sunday, December 7, 2025

માનસ પરમ વિશ્રામ - 968

 

રામ કથા - 968

માનસ પરમ વિશ્રામ

જબલપુર, ( M. P. )

શનિવાર, તારીખ 06/12/2025 થી રવિવાર, તારીખ 14/12/2025

મુખ્ય ચોપાઈ

 

सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो।

सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को॥

जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।

पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ॥3

 

1

Saturday, 06/12/2025

 

सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो।

सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को॥

जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।

पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ॥3

 

 

 

(परम) सुंदर, सुजान और कृपानिधान तथा जो अनाथों पर प्रेम करते हैं, ऐसे एक श्री रामचंद्र जी ही हैं। इनके समान निष्काम (निःस्वार्थ) हित करने वाला (सुहृद्) और मोक्ष देने वाला दूसरा कौन है? जिनकी लेशमात्र कृपा से मंदबुद्धि तुलसीदास ने भी परम शांति प्राप्त कर ली, उन श्री रामजी के समान प्रभु कहीं भी नहीं हैं॥3

श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम्

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् २३

इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा

क्रियेत भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् २४

 

Hearing [Shravana] and, Chanting [Kirtana] the Names of Lord Vishnu; Remembering [Smarana] His Leelas (Deeds); Serving His Lotus Feet [Paada-Sevana]; Worshipping [Arcana] and Eulogizing [Vandana] Him; Having the attitude of Servant [Dashya] and dearest Friend [Sakhya] towards Him, and Surrendering oneself [Atma-Nivedana] to Him,

In this manner, if a Person (Devotee) offers Lord Vishnu his/her Devotion (Bhakti) having these Nine devotional attributes,

That Person (Devotee) truly performs Devotional Service unto the Supreme Lord;

That I consider the best thing Learnt (fulfilling the ultimate goal of life).

December 11 is the Birthday of Ausho.

ભજનાનંદીએ બધાના પ્રશ્રોના જવાબ આપવા ન જોઈએ.

2

Sunday, 07/12/2025

रामसेतु  का अर्थ रामसे तुं हैं।

જે માર્ગ સહજ હોય તેને પકડો ………. કબીર

સાધુ સંગ બહું જરુરી છે, સાધુ આપણું કવચ બની જાય છે.

ક્ષણિક સમય માટેનો સાધુ સંગ અનેક પુસ્તકોથી પણ વધારે આપે છે.

સમાધિ એટલે પરમ વિશ્રામ.

 

 श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन

हरण भवभय दारुणं

नव कंज लोचन कंज मुख

कर कंज पद कंजारुणं

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।

सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः मे प्रियः।।12.16।।

 

जो आकाङ्क्षासे रहित, बाहर-भीतरसे पवित्र, दक्ष, उदासीन, व्यथासे रहित और सभी आरम्भोंका अर्थात् नये-नये कर्मोंके आरम्भका सर्वथा त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

Day 3

Monday, 08/12/2025

સામૂહિક પરમ વિશ્રામ ન મળે.

સામૂહિક વિશ્રામ – આરામ મળે પણ સામૂહિક પરમ વિશ્રામ ન મળે.

પરમ વિશ્રામ વ્યક્તિગત છે જે કોઈની કૃપાથી મળે.

નિર્માણ કરી શકાય પણ નિર્વાણ આપી શકાય.

એકાગ્રતામાં એકની અગ્રતા છે જ્યારે એકાંતમાં એકનો પણ અંત થઈ જાય છે.

Day 4

Tuesday, 09/12/2025

 

बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष बिभंजनि॥

रामकथा कलि पंनग भरनी। पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी॥3॥

रामकथा पण्डितों को विश्राम देने वाली, सब मनुष्यों को प्रसन्न करने वाली और कलियुग के पापों का नाश करने वाली है। रामकथा कलियुग रूपी साँप के लिए मोरनी है और विवेक रूपी अग्नि के प्रकट करने के लिए अरणि (मंथन की जाने वाली लकड़ी) है, (अर्थात इस कथा से ज्ञान की प्राप्ति होती है)॥3॥

त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया॥

एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ॥2॥

वहाँ तीनों प्रकार की (शीतल, मंद और सुगंध) वायु बहती रहती है और उसकी छाया बड़ी ठंडी रहती है। वह शिवजी के विश्राम करने का वृक्ष है, जिसे वेदों ने गाया है। एक बार प्रभु श्री शिवजी उस वृक्ष के नीचे गए और उसे देखकर उनके हृदय में बहुत आनंद हुआ॥2॥

सुर समूह बिनती करि पहुँचे निज निज धाम।

जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम॥191

देवताओं के समूह विनती करके अपने-अपने लोक में जा पहुँचे। समस्त लोकों को शांति देने वाले, जगदाधार प्रभु प्रकट हुए॥191॥

लरिका श्रमित उनीद बस सयन करावहु जाइ।

अस कहि गे बिश्रामगृहँ राम चरन चितु लाइ॥355॥

लड़के थके हुए नींद के वश हो रहे हैं, इन्हें ले जाकर शयन कराओ। ऐसा कहकर राजा श्री रामचन्द्रजी के चरणों में मन लगाकर विश्राम भवन में चले गए॥355॥

राम  कीन्ह  बिश्राम  निसि  प्रात  प्रयाग  नहाइ।

चले  सहितसिय  लखन  जन  मुदित  मुनिहि  सिरु  नाइ॥108॥

श्री  रामजी  ने  रात  को  वहीं  विश्राम  किया  और  प्रातःकाल  प्रयागराज  का  स्नान  करके  और  प्रसन्नता  के  साथ  मुनि  को  सिर  नवाकर  श्री  सीताजी,  लक्ष्मणजी  और  सेवक  गुह  के  साथ  वे  चले॥108॥ 

धर्म  सेतु  करुनायतन  कस    कहु  अस  राम।

लोग  दुखित  दिन  दुइ  दरस  देखि  लहहुँ  बिश्राम॥248॥

(वशिष्ठजी  ने  कहा-)  हे  राम!  तुम  धर्म  के  सेतु  और  दया  के  धाम  हो,  तुम  भला  ऐसा  क्यों    कहो?  लोग  दुःखी  हैं।  दो  दिन  तुम्हारा  दर्शन  कर  शांति  लाभ  कर  लें॥248॥

बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।

तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम॥16॥

जिनको कर्म, वचन और मन से मेरी ही गति है और जो निष्काम भाव से मेरा भजन करते हैं, उनके हृदय कमल में मैं सदा विश्राम किया करता हूँ॥16॥

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥1॥

हनुमान्‌जी ने उसे हाथ से छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा- भाई! श्री रामचंद्रजी का काम किए बिना मुझे विश्राम कहाँ?॥1॥

तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।

जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥46॥

तब तक जीव की कुशल नहीं और न स्वप्न में भी उसके मन को शांति है, जब तक वह शोक के घर काम (विषय-कामना) को छोड़कर श्री रामजी को नहीं भजता॥46॥

ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम।

भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम॥78॥

 जो जीवों के द्रोह में रत है, मोह के बस हो रहा है, रामविमुख है और कामासक्त है, उसको क्या कभी स्वप्न में भी सम्पत्ति, शुभ शकुन और चित्त की शांति हो सकती है?॥78॥

जय राम सोभा धाम। दायक प्रनत बिश्राम।।

धृत त्रोन बर सर चाप। भुजदंड प्रबल प्रताप।।1।।

शोभा के धाम, शरणागत को विश्राम देने वाले, श्रेष्ठ तरकस, धनुष और बाण धारण किए हुए, प्रबल प्रतापी भुज दंडों वाले श्रीरामचंद्रजी की जय हो! ।।1।।

जहँ जहँ कृपासिंधु बन कीन्ह बास बिश्राम।

सकल देखाए जानकिहि कहे सबन्हि के नाम॥119 ख॥

वन में जहाँ-तहाँ करुणा सागर श्री रामचंद्रजी ने निवास और विश्राम किया था, वे सब स्थान प्रभु ने जानकीजी को दिखलाए और सबके नाम बतलाए॥119 (ख)॥

सोइ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम।।

कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम।।82ख।।

 

श्रीरामचन्द्रजी मेरे साथ फिर वही लड़कपन करने लगे। मैं करोड़ों (असंख्य) प्रकारसे मन को समझता था, पर वह शान्ति नहीं पाता था।।82(ख)।।

कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु।

चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ।।89ख।।

 

हे तात ! स्वाभाविक सन्तोष के बिना क्या कोई शान्ति पा सकता है ? [चाहे] करोड़ों उपाय करके पच-पच मरिये; [फिर भी] क्या कभी जलके बिना नाव चल सकती है ?।।89(ख)।।

रिषय संग रघुबंस मनि करि भोजनु बिश्रामु।

बैठे प्रभु भ्राता सहित दिवसु रहा भरि जामु॥217॥

रघुकुल के शिरोमणि प्रभु श्री रामचन्द्रजी ऋषियों के साथ भोजन और विश्राम करके भाई लक्ष्मण समेत बैठे। उस समय पहरभर दिन रह गया था॥217॥

करि मुनि चरन सरोज प्रनामा। आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा॥

बिगत निसा रघुनायक जागे। बंधु बिलोकि कहन अस लागे॥3॥

मुनि के चरण कमलों में प्रणाम करके, आज्ञा पाकर उन्होंने विश्राम किया, रात बीतने पर श्री रघुनाथजी जागे और भाई को देखकर ऐसा कहने लगे-॥3॥

लरिका श्रमित उनीद बस सयन करावहु जाइ।

अस कहि गे बिश्रामगृहँ राम चरन चितु लाइ॥355॥

लड़के थके हुए नींद के वश हो रहे हैं, इन्हें ले जाकर शयन कराओ। ऐसा कहकर राजा श्री रामचन्द्रजी के चरणों में मन लगाकर विश्राम भवन में चले गए॥355॥

राम  कीन्ह  बिश्राम  निसि  प्रात  प्रयाग  नहाइ।

चले  सहितसिय  लखन  जन  मुदित  मुनिहि  सिरु  नाइ॥108॥

श्री  रामजी  ने  रात  को  वहीं  विश्राम  किया  और  प्रातःकाल  प्रयागराज  का  स्नान  करके  और  प्रसन्नता  के  साथ  मुनि  को  सिर  नवाकर  श्री  सीताजी,  लक्ष्मणजी  और  सेवक  गुह  के  साथ  वे  चले॥108॥ 

जहँ  सिंसुपा  पुनीत  तर  रघुबर  किय  बिश्रामु।

अति  सनेहँ  सादर  भरत  कीन्हेउ  दंड  प्रनामु॥198॥

जहाँ  पवित्र  अशोक  के  वृक्ष  के  नीचे  श्री  रामजी  ने  विश्राम  किया  था।  भरतजी  ने  वहाँ  अत्यन्त  प्रेम  से  आदरपूर्वक  दण्डवत  प्रणाम  किया॥198॥ 

अंतरजामी  रामु  सकुच  सप्रेम  कृपायतन।

चलिअ  करिअ  बिश्रामु  यह  बिचारि  दृढ़  आनि  मन॥201॥

श्री  रामचंद्रजी  अंतर्यामी  तथा  संकोच,  प्रेम  और  कृपा  के  धाम  हैं,  यह  विचार  कर  और  मन  में  दृढ़ता  लाकर  चलिए  और  विश्राम  कीजिए॥201॥ 

सेवक  सुहृद  सचिवसुत  साथा।  सुमिरत  लखनु  सीय  रघुनाथा॥

जहँ  जहँ  राम  बास  बिश्रामा।  तहँ  तहँ  करहिं  सप्रेम  प्रनामा॥4॥

सेवक,  मित्र  और  मंत्री  के  पुत्र  उनके  साथ  हैं।  लक्ष्मण,  सीताजी  और  श्री  रघुनाथजी  का  स्मरण  करते  जा  रहे  हैं।  जहाँ-जहाँ  श्री  रामजी  ने  निवास  और  विश्राम  किया  था,  वहाँ-वहाँ  वे  प्रेमसहित  प्रणाम  करते  हैं॥4॥

दुघरी  साधि  चले  ततकाला।  किए  बिश्रामु    मग  महिपाला॥

भोरहिं  आजु  नहाइ  प्रयागा।  चले  जमुन  उतरन  सबु  लागा॥3॥

वे  दुघड़िया  मुहूर्त  साधकर  उसी  समय  चल  पड़े।  राजा  ने  रास्ते  में  कहीं  विश्राम  भी  नहीं  किया।  आज  ही  सबेरे  प्रयागराज  में  स्नान  करके  चले  हैं।  जब  सब  लोग  यमुनाजी  उतरने  लगे,॥3॥

पद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा॥

भृकुटि बिलास भयंकर काला। नयन दिवाकर कच घन माला॥1॥

 पाताल (जिन विश्व रूप भगवान्‌ का) चरण है, ब्रह्म लोक सिर है, अन्य (बीच के सब) लोकों का विश्राम (स्थिति) जिनके अन्य भिन्न-भिन्न अंगों पर है। भयंकर काल जिनका भृकुटि संचालन (भौंहों का चलना) है। सूर्य नेत्र हैं, बादलों का समूह बाल है॥1॥

 

न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।

परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद्यतयो विशन्ति ॥

 

उस (अमृत) की प्राप्ति न कर्म के द्वारा, न सन्तान के द्वारा और न ही धन के द्वारा हो पाती है। (उस) अमृतत्व को सम्यक् रूप से (ब्रह्म को जानने वालों ने) केवल त्याग के द्वारा ही प्राप्त किया है। स्वर्गलोक से भी ऊपर गुहा अर्थात् बुद्धि के गह्वर में प्रतिष्ठित होकर जो ब्रह्मलोक प्रकाश से परिपूर्ण है, ऐसे उस (ब्रह्मलोक) में संयमशील योगीजन ही प्रविष्ट होते हैं ॥

 

…………… कैवल्योपनिषद् Verse ३

જ્યારે લોકેષ્ણા, પુત્રેષ્ણા અને ધનેષ્ણા ત્યાગમાં પરિવર્તિત થાય ત્યારે અમૃતની પ્રાપ્તિ થાય.

 

Day 8

Saturday, 13/12/2025

 

यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमानं भगवो विजिज्ञास इति॥

 

 

"The infinite is bliss. There is no bliss in anything finite. Only the Infinite is bliss. One must desire to understand the Infinite." "Venerable Sir, I desire to understand the Infinite."

 

 

 

 

॥ इति त्रयोविंशः खण्डः ॥

 

 

1. Sanatkumāra said: ‘That which is infinite is the source of happiness. There is no happiness in the finite. Happiness is only in the infinite. But one must try to understand what the infinite is.’ Nārada replied, ‘Sir, I want to clearly understand the infinite’.

 

If you attain bhūmā, then you have real happiness. What is bhūmā? It is Brahman. It is the biggest. It is infinite. Something is infinite when it is without any limitations in terms of time and space. Even our own lives are limited. We were born at a certain point in time and we shall live for a certain span of time. It may be for a hundred years or it may be less, but the body will not last forever.

 

Then why should we bother about God or Brahman or something that is said to be infinite? Because we want to be happy. Perhaps you are very fond of sweets and enjoy eating them. But when you have finished eating them your joy is gone. Moreover, if you eat too many then you become sick and are miserable. Only in the infinite is there real joy, real happiness, real peace—peace that is constant, always there, and never disturbed. As Sanatkumāra says, ‘Na alpe sukham asti—there is no happiness in that which is small, limited, or short-lived.’

 

 

 

Śakara says, anything that is finite causes tṛṣṇā, thirst—that is, it increases your desire for more. Whatever you get, you desire still more. Suppose you possess the whole world; even then you would not be happy. Therefore that which is finite is dukhabījam—the seed of unhappiness.

 

As long as you are confined to the limited world of sense experience you can never be happy. You have to go beyond sense experience. When you attain the state of bhūmā you feel you have got everything you have ever wanted. As the Gītā says (VI.22): ‘Attaining that, one does not regard anything to be higher.’

 

Source : https://www.wisdomlib.org/hinduism/book/chandogya-upanishad-english/d/doc239402.html