રામ કથા - 968
માનસ પરમ વિશ્રામ
જબલપુર, ( M. P. )
શનિવાર, તારીખ 06/12/2025
થી રવિવાર, તારીખ 14/12/2025
મુખ્ય ચોપાઈ
सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो।
सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद
सम आन को॥
जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।
पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ॥3॥
1
Saturday,
06/12/2025
सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो।
सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद
सम आन को॥
जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।
पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ॥3॥
(परम)
सुंदर, सुजान और कृपानिधान तथा
जो अनाथों पर प्रेम करते
हैं, ऐसे एक श्री
रामचंद्र जी ही हैं।
इनके समान निष्काम (निःस्वार्थ)
हित करने वाला (सुहृद्)
और मोक्ष देने वाला दूसरा
कौन है? जिनकी लेशमात्र
कृपा से मंदबुद्धि तुलसीदास
ने भी परम शांति
प्राप्त कर ली, उन
श्री रामजी के समान प्रभु
कहीं भी नहीं हैं॥3॥
श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ २३ ॥
इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा ।
क्रियेत भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ॥ २४ ॥
Hearing [Shravana] and, Chanting
[Kirtana] the Names of Lord Vishnu; Remembering [Smarana] His Leelas (Deeds);
Serving His Lotus Feet [Paada-Sevana]; Worshipping [Arcana] and Eulogizing
[Vandana] Him; Having the attitude of Servant [Dashya] and dearest Friend
[Sakhya] towards Him, and Surrendering oneself [Atma-Nivedana] to Him,
In this manner, if a Person
(Devotee) offers Lord Vishnu his/her Devotion (Bhakti) having these Nine
devotional attributes,
That Person (Devotee) truly
performs Devotional Service unto the Supreme Lord;
That I consider the best thing
Learnt (fulfilling the ultimate goal of life).
December 11 is the Birthday of Ausho.
ભજનાનંદીએ બધાના
પ્રશ્રોના જવાબ આપવા ન જોઈએ.
2
Sunday, 07/12/2025
रामसेतु का अर्थ रामसे तुं हैं।
જે માર્ગ સહજ
હોય તેને પકડો ………. કબીર
સાધુ સંગ બહું
જરુરી છે, સાધુ આપણું કવચ બની જાય છે.
ક્ષણિક સમય
માટેનો સાધુ સંગ અનેક પુસ્તકોથી પણ વધારે આપે છે.
સમાધિ એટલે
પરમ વિશ્રામ.
हरण भवभय दारुणं ।
नव कंज लोचन कंज मुख
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।12.16।।
जो आकाङ्क्षासे
रहित, बाहर-भीतरसे पवित्र, दक्ष, उदासीन, व्यथासे रहित और सभी आरम्भोंका अर्थात् नये-नये कर्मोंके आरम्भका सर्वथा त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।
Day 3
Monday, 08/12/2025
સામૂહિક
પરમ વિશ્રામ ન મળે.
સામૂહિક
વિશ્રામ – આરામ મળે પણ સામૂહિક પરમ વિશ્રામ ન મળે.
પરમ
વિશ્રામ વ્યક્તિગત છે જે કોઈની કૃપાથી મળે.
નિર્માણ
કરી શકાય પણ નિર્વાણ આપી શકાય.
એકાગ્રતામાં
એકની અગ્રતા છે જ્યારે એકાંતમાં એકનો પણ અંત થઈ જાય છે.
Day 4
Tuesday, 09/12/2025
बुध बिश्राम सकल जन रंजनि।
रामकथा कलि कलुष बिभंजनि॥
रामकथा कलि पंनग भरनी।
पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी॥3॥
रामकथा
पण्डितों को विश्राम देने वाली, सब मनुष्यों को प्रसन्न करने वाली और कलियुग के पापों
का नाश करने वाली है। रामकथा कलियुग रूपी साँप के लिए मोरनी है और विवेक रूपी अग्नि
के प्रकट करने के लिए अरणि (मंथन की जाने वाली लकड़ी) है, (अर्थात इस कथा से ज्ञान
की प्राप्ति होती है)॥3॥
त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया।
सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया॥
एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ।
तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ॥2॥
वहाँ
तीनों प्रकार की (शीतल, मंद और सुगंध) वायु बहती रहती है और उसकी छाया बड़ी ठंडी रहती
है। वह शिवजी के विश्राम करने का वृक्ष है, जिसे वेदों ने गाया है। एक बार प्रभु श्री
शिवजी उस वृक्ष के नीचे गए और उसे देखकर उनके हृदय में बहुत आनंद हुआ॥2॥
सुर समूह बिनती करि पहुँचे
निज निज धाम।
जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल
लोक बिश्राम॥191
देवताओं
के समूह विनती करके अपने-अपने लोक में जा पहुँचे। समस्त लोकों को शांति देने वाले,
जगदाधार प्रभु प्रकट हुए॥191॥
लरिका श्रमित उनीद बस सयन
करावहु जाइ।
अस कहि गे बिश्रामगृहँ
राम चरन चितु लाइ॥355॥
लड़के
थके हुए नींद के वश हो रहे हैं, इन्हें ले जाकर शयन कराओ। ऐसा कहकर राजा श्री रामचन्द्रजी
के चरणों में मन लगाकर विश्राम भवन में चले गए॥355॥
राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग
नहाइ।
चले सहितसिय
लखन जन मुदित मुनिहि सिरु नाइ॥108॥
श्री रामजी ने रात को वहीं विश्राम किया और प्रातःकाल
प्रयागराज का स्नान करके और प्रसन्नता के साथ मुनि को सिर नवाकर श्री सीताजी, लक्ष्मणजी
और सेवक गुह के साथ वे चले॥108॥
धर्म सेतु करुनायतन कस न कहु अस राम।
लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम॥248॥
(वशिष्ठजी ने कहा-) हे राम! तुम धर्म के सेतु और दया के धाम हो, तुम भला ऐसा क्यों न कहो? लोग दुःखी हैं। दो दिन तुम्हारा
दर्शन कर शांति लाभ कर लें॥248॥
बचन कर्म मन मोरि गति भजनु
करहिं निःकाम।
तिन्ह के हृदय कमल महुँ
करउँ सदा बिश्राम॥16॥
जिनको
कर्म, वचन और मन से मेरी ही गति है और जो निष्काम भाव से मेरा भजन करते हैं, उनके हृदय
कमल में मैं सदा विश्राम किया करता हूँ॥16॥
हनूमान तेहि परसा कर पुनि
कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु
मोहि कहाँ बिश्राम॥1॥
हनुमान्जी
ने उसे हाथ से छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा- भाई! श्री रामचंद्रजी का काम किए बिना
मुझे विश्राम कहाँ?॥1॥
तब लगि कुसल न जीव कहुँ
सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ
सोक धाम तजि काम॥46॥
तब
तक जीव की कुशल नहीं और न स्वप्न में भी उसके मन को शांति है, जब तक वह शोक के घर काम
(विषय-कामना) को छोड़कर श्री रामजी को नहीं भजता॥46॥
ताहि कि संपति सगुन सुभ
सपनेहुँ मन बिश्राम।
भूत द्रोह रत मोहबस राम
बिमुख रति काम॥78॥
जो जीवों के द्रोह में रत है, मोह के बस हो रहा है,
रामविमुख है और कामासक्त है, उसको क्या कभी स्वप्न में भी सम्पत्ति, शुभ शकुन और चित्त
की शांति हो सकती है?॥78॥
जय राम सोभा धाम। दायक
प्रनत बिश्राम।।
धृत त्रोन बर सर चाप। भुजदंड
प्रबल प्रताप।।1।।
शोभा
के धाम, शरणागत को विश्राम देने वाले, श्रेष्ठ तरकस, धनुष और बाण धारण किए हुए, प्रबल
प्रतापी भुज दंडों वाले श्रीरामचंद्रजी की जय हो! ।।1।।
जहँ जहँ कृपासिंधु बन कीन्ह
बास बिश्राम।
सकल देखाए जानकिहि कहे
सबन्हि के नाम॥119 ख॥
वन
में जहाँ-तहाँ करुणा सागर श्री रामचंद्रजी ने निवास और विश्राम किया था, वे सब स्थान
प्रभु ने जानकीजी को दिखलाए और सबके नाम बतलाए॥119 (ख)॥
सोइ लरिकाई मो सन करन लगे
पुनि राम।।
कोटि भाँति समुझावउँ मनु
न लहइ बिश्राम।।82ख।।
श्रीरामचन्द्रजी
मेरे साथ फिर वही लड़कपन करने लगे। मैं करोड़ों (असंख्य) प्रकारसे मन को समझता था,
पर वह शान्ति नहीं पाता था।।82(ख)।।
कोउ बिश्राम कि पाव तात
सहज संतोष बिनु।
चलै कि जल बिनु नाव कोटि
जतन पचि पचि मरिअ।।89ख।।
हे
तात ! स्वाभाविक सन्तोष के बिना क्या कोई शान्ति पा सकता है ? [चाहे] करोड़ों उपाय
करके पच-पच मरिये; [फिर भी] क्या कभी जलके बिना नाव चल सकती है ?।।89(ख)।।
रिषय संग रघुबंस मनि करि
भोजनु बिश्रामु।
बैठे प्रभु भ्राता सहित
दिवसु रहा भरि जामु॥217॥
रघुकुल
के शिरोमणि प्रभु श्री रामचन्द्रजी ऋषियों के साथ भोजन और विश्राम करके भाई लक्ष्मण
समेत बैठे। उस समय पहरभर दिन रह गया था॥217॥
करि मुनि चरन सरोज प्रनामा।
आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा॥
बिगत निसा रघुनायक जागे।
बंधु बिलोकि कहन अस लागे॥3॥
मुनि
के चरण कमलों में प्रणाम करके, आज्ञा पाकर उन्होंने विश्राम किया, रात बीतने पर श्री
रघुनाथजी जागे और भाई को देखकर ऐसा कहने लगे-॥3॥
लरिका श्रमित उनीद बस सयन
करावहु जाइ।
अस कहि गे बिश्रामगृहँ
राम चरन चितु लाइ॥355॥
लड़के
थके हुए नींद के वश हो रहे हैं, इन्हें ले जाकर शयन कराओ। ऐसा कहकर राजा श्री रामचन्द्रजी
के चरणों में मन लगाकर विश्राम भवन में चले गए॥355॥
राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग
नहाइ।
चले सहितसिय
लखन जन मुदित मुनिहि सिरु नाइ॥108॥
श्री रामजी ने रात को वहीं विश्राम किया और प्रातःकाल
प्रयागराज का स्नान करके और प्रसन्नता के साथ मुनि को सिर नवाकर श्री सीताजी, लक्ष्मणजी
और सेवक गुह के साथ वे चले॥108॥
जहँ सिंसुपा
पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु।
अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु॥198॥
जहाँ पवित्र
अशोक के वृक्ष के नीचे श्री रामजी ने विश्राम
किया था। भरतजी ने वहाँ अत्यन्त प्रेम से आदरपूर्वक
दण्डवत प्रणाम किया॥198॥
अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम
कृपायतन।
चलिअ करिअ बिश्रामु यह बिचारि दृढ़ आनि मन॥201॥
श्री रामचंद्रजी
अंतर्यामी तथा संकोच,
प्रेम और कृपा के धाम हैं, यह विचार कर और मन में दृढ़ता लाकर चलिए और विश्राम
कीजिए॥201॥
सेवक सुहृद सचिवसुत साथा। सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा॥
जहँ जहँ राम बास बिश्रामा। तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा॥4॥
सेवक, मित्र और मंत्री
के पुत्र उनके साथ हैं। लक्ष्मण, सीताजी
और श्री रघुनाथजी
का स्मरण करते जा रहे हैं। जहाँ-जहाँ
श्री रामजी ने निवास और विश्राम किया था, वहाँ-वहाँ
वे प्रेमसहित प्रणाम
करते हैं॥4॥
दुघरी साधि चले ततकाला।
किए बिश्रामु न मग महिपाला॥
भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा।
चले जमुन उतरन सबु लागा॥3॥
वे दुघड़िया
मुहूर्त साधकर उसी समय चल पड़े। राजा ने रास्ते
में कहीं विश्राम
भी नहीं किया। आज ही सबेरे प्रयागराज
में स्नान करके चले हैं। जब सब लोग यमुनाजी
उतरने लगे,॥3॥
पद पाताल सीस अज धामा।
अपर लोक अँग अँग बिश्रामा॥
भृकुटि बिलास भयंकर काला।
नयन दिवाकर कच घन माला॥1॥
पाताल (जिन विश्व रूप भगवान् का) चरण है, ब्रह्म
लोक सिर है, अन्य (बीच के सब) लोकों का विश्राम (स्थिति) जिनके अन्य भिन्न-भिन्न अंगों
पर है। भयंकर काल जिनका भृकुटि संचालन (भौंहों का चलना) है। सूर्य नेत्र हैं, बादलों
का समूह बाल है॥1॥
न कर्मणा न प्रजया धनेन
त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।
परेण नाकं निहितं गुहायां
विभ्राजते यद्यतयो विशन्ति ॥
उस
(अमृत) की प्राप्ति न कर्म के द्वारा, न सन्तान के द्वारा और न ही धन के द्वारा हो
पाती है। (उस) अमृतत्व को सम्यक् रूप से (ब्रह्म को जानने वालों ने) केवल त्याग के
द्वारा ही प्राप्त किया है। स्वर्गलोक से भी ऊपर गुहा अर्थात् बुद्धि के गह्वर में
प्रतिष्ठित होकर जो ब्रह्मलोक प्रकाश से परिपूर्ण है, ऐसे उस (ब्रह्मलोक) में संयमशील
योगीजन ही प्रविष्ट होते हैं ॥
……………
कैवल्योपनिषद् Verse ३
જ્યારે
લોકેષ્ણા, પુત્રેષ્ણા અને ધનેષ્ણા ત્યાગમાં પરિવર્તિત થાય ત્યારે અમૃતની પ્રાપ્તિ થાય.
Day 8
Saturday, 13/12/2025
यो
वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमानं
भगवो विजिज्ञास इति॥
"The
infinite is bliss. There is no bliss in anything finite. Only the Infinite is
bliss. One must desire to understand the Infinite." "Venerable Sir, I
desire to understand the Infinite."
॥
इति त्रयोविंशः खण्डः ॥
1.
Sanatkumāra said: ‘That which is infinite is
the source of happiness. There is no happiness in the finite. Happiness is only
in the infinite. But one must try to understand what the infinite is.’ Nārada
replied, ‘Sir, I want to clearly understand the infinite’.
If
you attain bhūmā,
then you have real happiness. What is bhūmā?
It is Brahman. It is the biggest. It is infinite. Something is infinite when it
is without any limitations in terms of time and space. Even our own lives are
limited. We were born at a certain point in time and we shall live for a
certain span of time. It may be for a hundred years or it may be less, but the
body will not last forever.
Then
why should we bother about God or Brahman or something that is said to be
infinite? Because we want to be happy. Perhaps you are very fond of sweets and
enjoy eating them. But when you have finished eating them your joy is gone.
Moreover, if you eat too many then you become sick and are miserable. Only in
the infinite is there real joy, real happiness, real peace—peace that is
constant, always there, and never disturbed. As Sanatkumāra
says, ‘Na alpe sukham asti—there is no happiness in that which is small,
limited, or short-lived.’
Śaṅkara
says, anything that is finite causes tṛṣṇā, thirst—that is, it increases your
desire for more. Whatever you get, you desire still more. Suppose you possess
the whole world; even then you would not be happy. Therefore that which is
finite is duḥkhabījam—the
seed of unhappiness.
As
long as you are confined to the limited world of sense experience you can never
be happy. You have to go beyond sense experience. When you attain the state of
bhūmā
you feel you have got everything you have ever wanted. As the Gītā
says (VI.22): ‘Attaining that, one does not regard anything to be higher.’
Source
: https://www.wisdomlib.org/hinduism/book/chandogya-upanishad-english/d/doc239402.html
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