રામ કથા - 982
માનસ ગુરુ પ્રસાદ
Harvard, Massachusetts,
USA
શનિવાર, તારીખ 15/08/2026
થી રવિવાર, તારીખ 23/08/2026
મુખ્ય પંક્તિઓ
गुर प्रसाद सब जानिअ राजा।
कहिअ न आपन जानि अकाजा॥
मख रखवारी करि दुहुँ भाईं।
गुरु प्रसाद सब बिद्या पाईं॥
सहित समाज तुम्हार हमारा।
घर बन गुर प्रसाद रखवारा॥
Saturday, 15/08/2026
नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा।
सत्यकेतु तव पिता नरेसा॥
गुर प्रसाद सब जानिअ राजा।
कहिअ न आपन जानि अकाजा॥1॥
तुम्हारा
नाम प्रतापभानु है, महाराज सत्यकेतु तुम्हारे पिता थे। हे राजन्! गुरु की कृपा से
मैं सब जानता हूँ, पर अपनी हानि समझकर कहता नहीं॥1॥
मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी।
ईस अनेक करवरें टारी॥
मख रखवारी करि दुहुँ भाईं।
गुरु प्रसाद सब बिद्या पाईं॥1॥
हे
तात! मैं बलैया लेती हूँ, मुनि की कृपा से ही ईश्वर ने तुम्हारी बहुत सी बलाओं को टाल
दिया। दोनों भाइयों ने यज्ञ की रखवाली करके गुरुजी के प्रसाद से सब विद्याएँ पाईं॥1॥
सहित समाज तुम्हार हमारा।
घर बन गुर प्रसाद रखवारा॥
मातु पिता गुर स्वामि निदेसू।
सकल धरम धरनीधर सेसू॥1॥
गुरुजी
का प्रसाद (अनुग्रह) ही घर में और वन में समाज सहित तुम्हारा और हमारा रक्षक है। माता,
पिता, गुरु और स्वामी की आज्ञा (का पालन) समस्त धर्म रूपी पृथ्वी को धारण करने में
शेषजी के समान है॥1॥
मंत्र महामनि बिषय ब्याल के।
मेटत कठिन कुअंक भाल के॥
हरन मोह तम दिनकर कर से। सेवक
सालि पाल जलधर से॥
विषयरूपी
साँप का जहर उतारने के लिए मंत्र और महामणि हैं। ये ललाट पर लिखे हुए कठिनता से मिटनेवाले
बुरे लेखों (मंद प्रारब्ध) को मिटा देनेवाले हैं। अज्ञानरूपी अंधकार को हरण करने के
लिए सूर्य किरणों के समान और सेवकरूपी धान के पालन करने में मेघ के समान हैं।
सदगुर ग्यान बिराग जोग के।
बिबुध बैद भव भीम रोग के॥
जननि जनक सिय राम प्रेम के।
बीज सकल ब्रत धरम नेम के॥
ज्ञान,
वैराग्य और योग के लिए सद्गुरु हैं और संसाररूपी भयंकर रोग का नाश करने के लिए देवताओं
के वैद्य (अश्विनीकुमार) के समान हैं। ये सीताराम के प्रेम के उत्पन्न करने के लिए
माता-पिता हैं और संपूर्ण व्रत, धर्म और नियमों के बीज हैं।
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2
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं
पादसेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्
॥
इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा
।
क्रियते भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्
॥
"जिन्ह के श्रवन समुद्र
समाना।
कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना॥
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे।
तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह
रूरे॥"
सरल
अर्थजिन लोगों के कान समुद्र के समान विशाल और गंभीर हैं (अर्थात जिनकी सुनने की क्षमता
और लालसा असीम है), और जिनमें आपकी सुंदर कथा रूपी अनेक नदियाँ निरंतर बहती रहती हैं।
वे नदियाँ सदा भरती तो हैं, पर समुद्र कभी भर कर पूर्ण (तृप्त या संतप्त) नहीं होता,
बल्कि उसकी कथा सुनने की प्यास और बढ़ती रहती है—ऐसे
भक्तों के हृदय रूपी घर ही भगवान आपके रहने योग्य सबसे सुंदर और पवित्र स्थान हैं।
तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं
कल्मषापहम्।
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि
गृणन्ति ते भूरिदा जनाः॥
हे
प्रियतम! आपकी कथा अमृत के समान है। विरह या संसार के दुखों से तप्त (पीड़ित) लोगों
के लिए यह जीवन देने वाली है। महापुरुषों और कवियों ने इसका हमेशा गान किया है। यह
सभी पापों को हरने वाली, सुनने में मंगलकारी और अत्यंत विस्तृत है। जो लोग इस कथा का
पृथ्वी पर प्रचार या गान करते हैं, वे वास्तव में सबसे बड़े दानी और परोपकारी हैं।
ગુરુ
સપ્તક
ધર્મ
ગુરુ
વર્મ
ગુરુ જે રક્ષા કરે છે.
अमल अचल मन त्रोन समाना। सम
जम नियम सिलीमुख नाना॥
कवच अभेद बिप्र गुर पूजा।
एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥5॥
निर्मल
(पापरहित) और अचल (स्थिर) मन तरकस के समान है। शम (मन का वश में होना), (अहिंसादि)
यम और (शौचादि) नियम- ये बहुत से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है।
इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है॥5॥
રામની
મૌલિક દેન ધર્મ રથ છે.
नाथ न रथ नहि तन पद त्राना।
केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥
सुनहु सखा कह कृपानिधाना।
जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥2॥
हे
नाथ! आपके न रथ है, न तन की रक्षा करने वाला कवच है और न जूते ही हैं। वह बलवान् वीर
रावण किस प्रकार जीता जाएगा? कृपानिधान श्री रामजी ने कहा- हे सखे! सुनो, जिससे जय
होती है, वह रथ दूसरा ही है॥2॥
सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य
सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा
कृपा समता रजु जोरे॥3॥
शौर्य
और धैर्य उस रथ के पहिए हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं।
बल, विवेक, दम (इंद्रियों का वश में होना) और परोपकार- ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा,
दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं॥3॥
कर्म
गुरु
मर्म
गुरु जो शास्त्रका मर्म जानता हैं।
चर्म
गुरु देहवादी गुरु
शर्म
गुरु
परम
गुरु