રામ કથા – 985
માનસ ભારત સ્વસ્તિક યાત્રા
- 985
શુક્રવાર, તારીખ 10/10/2026
થી શુક્રવાર, તારીખ 23/10/2026
મુખ્ય ચોપાઈ
मंगल भवन अमंगल हारी ।
उमा सहित जेहि जपत पुरारी
॥
मंगल भवन अमंगल हारी ।
द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी
॥
भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी
।
राम कथा जग मंगल करनी ॥
सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन
।
मंगलमय अति पावन पावन ॥
૧
શુક્રવાર, તારીખ ૧૦/૧૦/૨૦૨૬
કન્યાકુમારી
एहि महँ रघुपति नाम उदारा।
अति पावन पुरान श्रुति सारा॥
मंगल भवन अमंगल हारी। उमा
सहित जेहि जपत पुरारी॥1॥
इसमें
श्री रघुनाथजी का उदार नाम है, जो अत्यन्त पवित्र है, वेद-पुराणों का सार है, कल्याण
का भवन है और अमंगलों को हरने वाला है, जिसे पार्वतीजी सहित भगवान शिवजी सदा जपा करते
हैं॥1॥
बंदउँ बालरूप सोइ रामू। सब
सिधि सुलभ जपत जिसु नामू॥
मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ
सो दसरथ अजिर बिहारी॥2॥
मैं
उन्हीं श्री रामचन्द्रजी के बाल रूप की वंदना करता हूँ, जिनका नाम जपने से सब सिद्धियाँ
सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। मंगल के धाम, अमंगल के हरने वाले और श्री दशरथजी के आँगन
में खेलने वाले (बालरूप) श्री रामचन्द्रजी मुझ पर कृपा करें॥2॥
धूमउ तजइ सहज करुआई। अगरु
प्रसंग सुगंध बसाई॥
भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी।
राम कथा जग मंगल करनी॥5॥
धुआँ
भी अगर के संग से सुगंधित होकर अपने स्वाभाविक कड़ुवेपन को छोड़ देता है। मेरी कविता
अवश्य भद्दी है, परन्तु इसमें जगत का कल्याण करने वाली रामकथा रूपी उत्तम वस्तु का
वर्णन किया गया है। (इससे यह भी अच्छी ही समझी जाएगी।)॥5॥
सो बनु सैलु सुभायँ
सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन॥
महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू। सुखसागर
जहँ कीन्ह निवासू॥2॥
वह वन और पर्वत स्वाभाविक ही सुंदर, मंगलमय
और अत्यन्त पवित्रों
को भी पवित्र
करने वाला है। उसकी महिमा किस प्रकार
कही जाए, जहाँ सुख के समुद्र श्री रामजी ने निवास किया है॥2॥
ભારત
ભવ્ય તો હતું જ પણ આદિ શંકર ભગવાને ભારતને – ભારત પુરુષને દિવ્ય બનાવ્યું,સેવ્ય બનાવ્યું.
અધ્યાત્મ
ભારતને નવ્ય – નવીન પણ બનાવી શકે છે.
મન,
બુદ્ધિ, ચિત ના ઘોડાઓની લગામ અહંકારના હાથમાં આવી ગઈ છે.
કોઈ
પણ પ્રકારનો રેકોર્ડ બનાવવાની ચેષ્ટા અહંકાર છે.
બાપુએ
માનસ ચૌદ ની કથા કરવાની ઈચ્છા વ્યક્ત કરી.
માનસમાં
૧૪ નો મહિમા છે.
तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह
बरिस रामु बनबासी॥
सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू।
ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू॥2॥
तपस्वियों
के वेष में विशेष उदासीन भाव से (राज्य और कुटुम्ब आदि की ओर से भलीभाँति उदासीन होकर
विरक्त मुनियों की भाँति) राम चौदह वर्ष तक वन में निवास करें। कैकेयी के कोमल (विनययुक्त)
वचन सुनकर राजा के हृदय में ऐसा शोक हुआ जैसे चन्द्रमा की किरणों के स्पर्श से चकवा
विकल हो जाता है॥2॥
વાલ્મીકિજી
૧૪ સ્થાન બતાવે છે.
૧૪
+ ૧૪ = ૨૮
સ્વસ્તિક
૨૮ મું નક્ષત્ર છે.
સાધુ
સ્વયં તીર્થ છે.